देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान:कवि प्रदीप की जयंती पर विशेष

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स्व. प्रदीप की जयंती (6 फरवरी) पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि !

सिनेमा में उनकी पहचान बनी 1943 की फिल्म ‘किसमत’ के गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है’ से। इस गीत के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया था जिसकी वज़ह से प्रदीप को अरसे तक भूमिगत रहना पड़ा था।

सूरज रे जलते रहना !

ध्रुव गुप्त

हिंदी कविता और हिंदी सिनेमा में भी देशप्रेम, भाईचारे और मानवीय मूल्यों का अलख जगाने वाले गीतकारों में कवि प्रदीप उर्फ़ रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी का बहुत ख़ास मुक़ाम रहा है। वे अपने दौर में हिंदी कविता के एक अलग-से शख्सियत रहे।

तत्कालीन कवि सम्मेलनों का उन्हें ज़रूरी हिस्सा माना जाता था। उनकी जनप्रियता ने सिनेमा के लोगों का ध्यान उनकी तरफ खींचा। सिनेमा में उनकी पहचान बनी 1943 की फिल्म ‘किसमत’ के गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है’ से। इस गीत के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया था जिसकी वज़ह से प्रदीप को अरसे तक भूमिगत रहना पड़ा था।

उसके बाद के पांच दशकों में प्रदीप ने इकहतर फिल्मों के लिए सैकड़ों गीत लिखे।उनके लिखे कुछ बेहद लोकप्रिय गीत हैं – चल चल रे नौजवान, हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल, आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की, देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, बिगुल बज रहा आज़ादी का, आज के इस इंसान को ये क्या हो गया, ऊपर गगन विशाल, चलो चलें मां सपनों के गांव में, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला, अंधेरे में जो बैठे हैं ज़रा उनपर नज़र डालो, दूसरों का दुखड़ा दूर करने वाले, इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा, सूरज रे जलते रहना, मुखड़ा देख ले प्राणी जरा दर्पण में, पिंजरे के पंछी रे तेरा दरद न जाने कोय।

अपने अलग मिजाज और अंदाज़ की वजह से शैलेंद्र, हसरत, शकील बदायूंनी, राजेन्द्र कृष्ण, साहिर, मजरूह, कैफ़ी आज़मी, एस एच बिहारी जैसे उस दौर के प्रमुख गीतकारों के बीच भी उनकी एक सम्माननीय जगह बनी रही। अपने लिखे दर्जनों गीत उन्होंने खुद गाए भी थे। गायिकी का उनका अंदाज़ भी सबसे जुदा था। उनके लिख़े और लता जी के गाए गैरफिल्मी गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी’ को राष्ट्र गीत जैसी मक़बूलियत हासिल है। सिनेमा में अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1998 में उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादासाहब फाल्के अवार्ड’ से नवाज़ा था।

(लेखक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं,फिलवक्त स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं)
 

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